नॉर्थ चेन्नई की एक तंग गली से निकलकर दुनिया के सबसे बड़े कैरम मंच तक पहुंचना किसी चमत्कार से कम नहीं, लेकिन कीर्तना की कहानी बताती है कि महानता अक्सर वहीं जन्म लेती है, जहां उम्मीदें सबसे कमजोर होती हैं। तमिलनाडु की कीर्तना़ का जन्म एक साधारण भारतीय परिवार में हुआ। जब कीर्तना छह साल की थीं, तो उन्होंने पहली बार कैरम बोर्ड को छुआ। तब उन्हें अंदाजा नहीं था कि यही खेल एक दिन उनकी पहचान, उनका सहारा और उनका भविष्य बन जाएगा।

जिंदगी ने बहुत जल्दी उनकी परीक्षा ली, जब महज 12 साल की उम्र में पिता का साया उठ गया। परिवार पर आर्थिक संकट टूट पड़ा। किशोरावस्था आते-आते हालात ऐसे हो गए कि कीर्तना को पढ़ाई छोड़नी पड़ी। परिवार चलाने के लिए उन्हें लेथ वर्कशाॅप में काम करना शुरू कर दिया। यहां उनके हाथों में मशीन की गर्मी और कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ लेकिन फिर भी दिल में कैरम का जुनून जिंदा रहा।
जहां खेल को करियर मानना आज भी जोखिम भरा फैसला माना जाता है, वहां कैरम जैसे इंडोर गेम को चुनना और भी बड़ी चुनौती थी। दिनभर की थकान के बाद भी वह छोटे-छोटे टूर्नामेंट खेलती रहीं। इन मुकाबलों से उन्हें सिर्फ कुछ पैसे ही नहीं, बल्कि अपने सपने पर विश्वास मिलता गया। यही विश्वास उन्हें आगे बढ़ाता रहा।Sachin Tendulkar की लाडली सारा का बियर के साथ सड़क पर घूमने का video viral, लोगों ने किए ऐसे-ऐसे कॉमेंट्स
कीर्तना के सपनों को मिले पंख
फिर आया वह पल, जिसने इतिहास बदल दिया। मालदीव में आयोजित 7वें कैरम वर्ल्ड कप में कीर्तना़ ने दुनिया को चौंका दिया। उन्होंने, महिला सिंगल्स में स्वर्ण, डबल्स में स्वर्ण, टीम इवेंट में स्वर्ण और अंततः वर्ल्ड चैंपियन का खिताब अपने नाम कर लिया। हर जीत के साथ उन्होंने यह साबित किया कि कैरम सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि उच्च स्तर का प्रतिस्पर्धी खेल है। आज कीर्तना़ के हाथों में सिर्फ ट्रॉफियां नहीं हैं, उनके हाथों में उन लाखों बच्चों की उम्मीद है, जो गरीबी, हालात और सीमाओं के बावजूद बड़े सपने देखने की हिम्मत रखते हैं।