जब पॉप कल्चर और सोशल मीडिया पर फिल्मी सितारे और काल्पनिक किरदार छाए रहते हैं, तब भारत के असली ‘रॉयल्स’ यानी पूर्व राजघरानों की महिलाएं एक शांत लेकिन प्रभावशाली क्रांति लाने का प्रयास करती हैं। ये महिलाएं न तो शासन की चाह रखती हैं और न ही शानो-शौकत में खोई हैं, बल्कि इनका मिशन है भारत की पारंपरिक कला और शिल्प को पुनर्जीवित करना। आज की ये शाही महिलाएं दिखा रही हैं कि विरासत सिर्फ वंश नहीं, बल्कि योगदान और प्रभाव से जुड़ी होती है। आइए जानें, कैसे ये महिलाएं ग्रामीण कारीगरों को सशक्त बना रही हैं और भारत की खोती जा रही सांस्कृतिक धरोहर को विश्वपटल पर पहुंचा रही हैं।
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मयूरभंज की राजकुमारी अक्षिता भांज देव
ओडिशा की राजकुमारी अक्षिता भांज देव ने अपने पूर्वजों के बेलगड़िया महल को पुनर्स्थापित कर एक बुटीक होटल में तब्दील किया है। इस होटल की आय से मयूरभंज फाउंडेशन संचालित होता है, जो छऊ नृत्य, ढोकरा कला, सबाई घास के उत्पाद और प्राचीन हथकरघा तकनीकों को फिर से जीवित कर रहा है। उनका उद्देश्य न सिर्फ कला को संरक्षित करना है, बल्कि कलाकारों को आर्थिक आत्मनिर्भरता भी दिलाना है।
धेनकनाल की युवरानी मीनल कुमारी सिंहदेव
युवरानी मीनल कुमारी ओडिशा की प्रसिद्ध पत्ताचित्र कला को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर रही हैं। उनके ब्रांड ‘मीनाकेतन’ के जरिए पारंपरिक कला को आधुनिक डिज़ाइनों से जोड़ा गया है। वह स्थानीय कलाकारों को प्रशिक्षित कर रही हैं और इस कला को बाजार में लाभकारी बना रही हैं। इससे न केवल कला को नया जीवन मिला है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं को रोज़गार का साधन भी मिला है।

हिमाचल की कटोच रॉयल फैमिली कांगड़ा की प्राचीन चित्रकला को फिर से जीवंत करने के लिए स्थानीय कलाकारों के साथ कार्य कर रही है। रानी शैलजा कटोच ने न सिर्फ कांगड़ा पेंटिंग को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया है, बल्कि वह ‘कांगड़ी धाम’ पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना चाहती हैं।

झाबुआ की राजकुमारी नंदिनी सिंह
मध्य प्रदेश के झाबुआ की राजकुमारी नंदिनी सिंह ने गोंड और भील आदिवासी कला को दुनिया के सामने लाने का संकल्प लिया है। वह व्यक्तिगत शोकेस और क्यूरेटेड एक्जीबिशन के माध्यम से इन कलाओं को जागरूक और सजग कलेक्टरों तक पहुंचा रही हैं। उनकी कोशिशों से इन आदिवासी कलाकारों को मंच और सम्मान दोनों मिल रहा है।
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