Padma Shri Devaki Amma: जब दुनिया रिटायरमेंट की बात करती है, उस उम्र में केरल की देवकी अम्मा मिट्टी में उम्मीद बो रही थीं। उम्र 90 के पार, शरीर कमजोर, लेकिन सोच उतनी ही मजबूत जितनी एक सशक्त किसान की होनी चाहिए। पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित देवकी अम्मा सिर्फ एक किसान नहीं थीं, बल्कि जैविक खेती की जीवित मिसाल थीं। देवकी अम्मा का जीवन बताता है कि क्रांति कभी-कभी चुपचाप खेतों से शुरू होती है। उनकी कहानी सिर्फ सम्मान की नहीं, बल्कि उस भरोसे की है कि परंपरा और प्रगति साथ चल सकती हैं।
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कौन थीं देवकी अम्मा?
देवकी अम्मा केरल के अलप्पुझा ज़िले की रहने वाली थीं। वे औपचारिक शिक्षा से दूर रहीं, लेकिन खेती की समझ में उन्होंने किताबों को भी पीछे छोड़ दिया। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय देशी बीजों को बचाने, जैविक खेती को बढ़ावा देने और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने में लगाया।
खेती को बनाया जीवन का मिशन
देवकी अम्मा का मानना था कि “मिट्टी जिंदा रहेगी, तभी इंसान जिंदा रहेगा।” उन्होंने कभी रासायनिक खाद या कीटनाशक का सहारा नहीं लिया। उनकी खेती पूरी तरह आधारित थी,
- देसी बीज
- गोबर खाद
- प्राकृतिक कीट नियंत्रण
- पारंपरिक कृषि ज्ञान
उनके खेत में उगने वाली सब्ज़ियां, धान और अनाज स्वाद और पोषण दोनों में श्रेष्ठ माने जाते थे।
90 की उम्र में भी खेत में सक्रिय
यह बात देवकी अम्मा को खास बनाती है। जब शरीर साथ नहीं देता, तब भी वे किसानों को खेती सिखाती थीं। बीज बांटती थीं। महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करती थीं। वे मानती थीं कि खेती सिर्फ काम नहीं, सेवा है।
पद्मश्री से सम्मान
भारत सरकार ने 2020 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। यह सम्मान,
- जैविक खेती
- देसी बीज संरक्षण
- ग्रामीण महिलाओं को प्रेरित करने
- पारंपरिक कृषि ज्ञान को बचाने के लिए दिया गया।
देवकी अम्मा ने साबित किया कि असली योगदान उम्र या डिग्री नहीं देखता।
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