Thu, 29 Oct
--°C ...
Logo

ब्रेकिंग

वायरल वीडियो से 10 की पहचान, 2 बालिगों पर कार्रवाई

नशे में झूमते युवकों के बीच विवाद, युवक को बेरहमी से पीटने का वीडियो सामने आया

8वीं के छात्र से 100-100 बार गंदी गाली लिखवाई, अभिभावकों के सिग्नेचर भी मांगे; जांच के आदेश

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद शिलांग कोर्ट में किया आत्मसमर्पण, अब जेल में रहकर चलेगा ट्रायल

सप्लाई बाधित होने की आशंका से बढ़ी चिंता, भारत में सिलेंडर कीमतों पर पड़ सकता है असर

साथी का मोबाइल चुराकर बनाई नई UPI ID, ऑनलाइन गेमिंग की लत में गंवाई पूरी रकम

अभनपुर के लखना गांव में सनसनी, हत्या की आशंका; पहचान में जुटी पुलिस

सस्ते टूर पैकेज के झांसे में फंसाकर मांगी 1.20 करोड़ की फिरौती, 5 भारतीय गिरफ्तार

कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन, मरम्मत, शौचालय, वाहन स्टैंड और ट्रांसफार्मर की मांग

नाले में कार बहने के बाद चला लगातार रेस्क्यू, विशेषज्ञ गोताखोरों ने बरामद किए शव

सूचना

hello php

: ग्रैंडमदर्स की क्लास: 60 की उम्र में किताब-कॉपी लेकर फिर स्कूल पहुंचीं दादियां!

Vishva News / Mon, Oct 6, 2025 / Post views : 46

Share:
School For Grandmothers: भारत में जहां हर गली-मोहल्ले में बच्चों की पाठशालाएं हैं, वहीं महाराष्ट्र के ठाणे ज़िले के एक छोटे से गांव फांगणे में एक ऐसी अनोखी पाठशाला है, जहां बच्चों की नहीं बल्कि दादियों और नानियों की कक्षा लगती है। दादी-नानी के इस स्कूल का नाम है, “आजीबाईची शाळा” (Aajibaichi Shala) यानी दादियों की स्कूल।यह वही जगह है जहां 60 से 90 वर्ष की उम्र की बुज़ुर्ग महिलाएं गुलाबी साड़ी पहनकर, बस्ता टांगकर, ब्लैकबोर्ड के सामने बैठती हैं और अपने अधूरे सपने पूरे करती हैं, पढ़ना और लिखना सीखने का सपना। CG NEWS: मेमू ट्रेन में हादसा, यात्री के गिरने से हड़कंप… स्कूल का इतिहास? इस स्कूल की नींव योगेंद्र बांगड़ ने मोतिराम दलाल चैरिटेबल ट्रस्ट के सहयोग से साल 2016 में रखी थी। स्कूल की शुरुआत करने का विचार तब आया जब एक शिक्षक ने एक बुज़ुर्ग महिला को पूजा के दौरान यह कहते सुना कि 'काश, मैं खुद से भगवान के नाम पढ़ पाती।' फिर बुजुर्ग महिलाओं के लिए गांव के एक किसान के घर में दो घंटे की एक छोटी-सी कक्षा शुरू हुई और यहीं से जन्म हुआ भारत के पहले ‘ग्रैंडमदर्स स्कूल’ का। CG Weather Update: छत्तीसगढ़ में मौसम का मिज़ाज बिगड़ा.. येलो-ऑरेंज अलर्ट जारी, कई जिलों में झमाझम के आसार कैसे काम करता है ये स्कूल? यह स्कूल हर दिन सिर्फ दो घंटे चलता है। सभी छात्राएं गुलाबी साड़ी को अपनी स्कूल यूनिफॉर्म की तरह पहनती हैं, बस्ता लेकर आती हैं और मुस्कुराते हुए ‘अ’ से ‘अनार’ तक लिखना सीखती हैं। वे ABC, कविता, पहाड़े, गणित और पेंटिंग तक सीखती हैं। 70, 80, और यहां तक कि 90 साल की उम्र में भी उनका जोश देखने लायक होता है। इस स्कूल ने यह साबित कर दिया कि “शिक्षा कभी देर नहीं होती, बस मन में चाह होना चाहिए।” शुरुआत में यह कक्षा कुछ ही दादियों से शुरू हुई थी, पर धीरे-धीरे पूरे गांव की औरतों ने इसे अपनाया। अब यह आंदोलन बन चुका है ‘शिक्षा की गुलाबी क्रांति’।

Tags :

Share News:

विज्ञापन

विज्ञापन

जरूरी खबरें