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Vishva News / Fri, Aug 29, 2025 / Post views : 20
दहेज की आग में बेटी की मौत, लेकिन मां ने हार नहीं मानी
1979 में जब शशि बाला को उसके पति और ससुराल वालों ने जिंदा जला दिया, तब समाज और कानून दोनों ने इसे रसोई हादसा करार दिया। शादी को एक साल से कम हुआ था और अपराध सिर्फ इतना था कि दहेज की मांग पूरी नहीं हुई। सत्य रानी का दिल टूटा, लेकिन उन्होंने तय किया कि उनकी बेटी की मौत को व्यर्थ नहीं जाने देंगी।
अदालतों और सड़कों पर 34 साल लंबी जंग
सत्य रानी ने न्यायालय से लेकर सड़कों तक अपनी लड़ाई जारी रखी। वे संसद के बाहर खड़ी हुईं, रैलियाँ निकालीं और दूसरे पीड़ित परिवारों को जोड़ा। उनका केस सुप्रीम कोर्ट तक गया लेकिन उस दौर में दहेज की परिभाषा सीमित थी, इसलिए आरोपी बच निकला। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी।
शाहजहां आपा के साथ मिलकर की ‘शक्ति शालिनी’ की स्थापना
1987 में शाहजहां आपा, जिनकी बेटी भी दहेज हिंसा की शिकार हुई थी, के साथ मिलकर सत्य रानी ने ‘शक्ति शालिनी’ संगठन बनाया। यह संगठन पीड़ित महिलाओं के लिए आश्रय, कानूनी मदद और आत्मनिर्भरता का सहारा बना। इसने हजारों औरतों की जिंदगी बचाई।
उनके संघर्ष से बने कानून
सत्य रानी की निरंतर कोशिशों का नतीजा था कि भारत में पहली बार दहेज हत्या और क्रूरता के खिलाफ कड़े कानून बने। जिसमें शामिल है,
IPC 498A: पति या ससुराल वालों द्वारा क्रूरता
IPC 304B: दहेज मृत्यु
साक्ष्य अधिनियम 113A/ 113B - आत्महत्या या दहेज हत्या की स्थिति में जिम्मेदारी साबित करना।
इन कानूनों ने लाखों बेटियों को न्याय और सुरक्षा का सहारा दिया।
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अधूरी रही अपनी बेटी की न्याय की लड़ाई
सत्य रानी की बेटी शशि बाला को कभी न्याय नहीं मिला। 34 साल बाद आरोपी दोषी तो ठहराया गया लेकिन गिरफ्तारी से पहले ही गायब हो गया। यह भारतीय न्याय व्यवस्था की विडंबना थी। फिर भी सत्य रानी की जंग ने हजारों परिवारों को हिम्मत दी। आज उनकी विरासत हर उस महिला के लिए शक्ति है, जो अन्याय के खिलाफ खड़ी होती है।
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