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: Suparna Ghosh: 28 साल बिना छुट्टी पढ़ाती रहीं ‘सुपर टीचर’ सुपर्णा घोष, रिटायरमेंट के बाद भी बच्चों को मुफ्त सिखाने का जज्बा बरकरार

Vishva News / Tue, Dec 9, 2025 / Post views : 41

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Suparna Ghosh: सर्द हवाएं हों या तेज बारिश, चुनावी हलचल हो या कोई निजी कठिनाई, लेकिन एक शिक्षिका ऐसी भी हैं, जिन्होंने अपने 28 वर्षों के करियर में एक भी दिन छुट्टी नहीं ली। कर्तव्य की मिसाल इस महिला ने नौकरी के दौरान न तो बीमारी, ना ही कोई शादी समारोह किसी भी कारण से कोई छुट्टी की। वहीं जब वह रिटायर हुईं तो भी उनकी कर्तव्यनिष्ठता में कमी नहीं आई। इस शिक्षिका ने बिना फीस बच्चों को पढ़ाना जारी रखा। यह सूपर टीचर पश्चिम बंगाल के हुगली जिले की रहने वाली हैं। यहां राज्यधरपुर नेताजी हाई स्कूल में कार्यरत सुपर्णा घोष की कहानी हर किसी के लिए मिसाल है। मोहित चौहान लाइव परफॉर्म करते हुए गिर पड़े… शो बीच में ही रोकना पड़ा, अब ऐसी है हालत सुपर्णा घोष का जीवन परिचय हुगली की सुपर्णा घोष पेशे से शिक्षिका हैं। उन्होंने 2 मई 1997 से 31 अक्टूबर 2024 तक 28 साल 6 महीने अपने जीवन के करियर को दिए। लेकिन इस पूरी अवधि में उन्होंने एक भी छुट्टी नहीं ली। न तो सिक लीव और ना ही कैजुअल लीव। अब सुपर्णा सेवानिवृद्त हो चुकी हैं। हालांकि रिटायरमेंट के बाद भी सुपर्णा ने बिना तनख्वाह पढ़ाना जारी रखा। आज जब लोग नौकरी में छुट्टी पाने के अवसर खोजते हैं, सुपर्णा घोष उस सोच को चुनौती देती हैं। उनकी आंखों की चमक और शब्दों की दृढ़ता हमेशा यही कहती है, “स्कूल मेरा परिवार है। पढ़ाना मेरी पूजा।” शिक्षा का सपना दुर्गापुर में जन्मी और पली-बढ़ी सुपर्णा घोष के जीवन में किताबें, स्कूल और सपने हमेशा साथ रहे। सुपर्णा ने बर्दवान यूनिवर्सिटी से इतिहास में मास्टर्स की डिग्री हासिल की। बाद में चंदननगर गवर्नमेंट कॉलेज से बीएड किया। करियर की शुरुआत उन्होंने आर्मी पब्लिक स्कूल, गिरिडीह से की, जहां से उन्होंने पहली नौकरी की। इस बीच उन्होंने शादी की और हावड़ा आमता में शिफ्ट हो गईं। यहां से उनके जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ। जब वह गर्भवती थी, तब उन्हें श्रीरामपुर के स्कूल में नौकरी का अवसर मिला, जिन्हें अपनाने में उन्हें झिझक महसूस नहीं हुई। उन्होंने उस अवस्था में कर्तव्य पहले और कठिनाई को बाद में रखा। मां भी, गुरु भी बेटी के जन्म के कुछ ही दिनों बाद वो वापस कक्षा में थीं। उनकी नन्ही सी बच्ची घर पर नैनी के पास रहती और खुद मां स्कूल में बच्चों का भविष्य संवार रही होती। उन्होंने इसे संघर्ष नहीं विश्वास माना। उनकी बेटी ने भी चंदननगर के सेंट जोजेफ काॅन्वेंट से पढ़ाई पूरी करके इतिहास से आगे की शिक्षा हासिल की। आज वह खुद पेशे से टीचर हैं, बिल्कुल अपनी मां की तरह। India vs South Africa 1st T20I: फ्री में देख सकते हैं पहला मैच, जानिए यहां मैच शुरू होने का समय  बीमारी, तनाव और जिम्मेदारियां कुछ न बना रुकावट इन 28 वर्षों में पश्चिम बंगाल में तीन मुख्यमंत्री बदले। देश में नीतियां बदलीं, सिस्टम बदले लेकिन सुपर्णा घोष की हाजिरी रजिस्टर में एक भी अनुपस्थित नहीं लिखी गई। वह कहती हैं, “बीमार थी तो भी स्कूल गई। स्कूल ही सब कुछ है। बाकी सब बाद में।” रिटायरमेंट के बाद भी सेवा, बिना वेतन 31 अक्टूबर 2024 को जब उनका रिटायरमेंट हुआ, तब लोगों ने समझा अब सुपर्णा आराम करेंगी। लेकिन अगले ही दिन वो फिर उसी स्कूल में थीं। इस बार बिना सैलरी सिर्फ समर्पण के साथ। उनके लिए शिक्षा नौकरी नहीं, मानवता का कर्तव्य है। परिवार का मिला साथ  सुपर्णा के पति केमिकल इंजीनियर हैं। वह भी रिटायरमेंट के बाद भी काम कर रहे हैं। उन्होंने हमेशा पत्नी को प्रोत्साहित किया क्योंकि वो जानते हैं, उनकी पत्नी बच्चों के भविष्य की निर्माता है। सुपर्णा घोष ने सिर्फ इतिहास पढ़ाया नहीं, अपने जीवन से इतिहास रचा है। उनकी कहानी बताती है कि जब शिक्षक अपने कर्तव्य को पूजा मान ले तो देश का भविष्य कभी अंधेरा नहीं हो सकता।

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