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: “तुमसे है उजाला”: हापुड़ की शिक्षिका गरिमा त्यागी, कैमरे से समाज को दे रही नई दिशा

Vishva News / Wed, Sep 17, 2025 / Post views : 20

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उत्तर प्रदेश के हापुड़ की रहने वाली गरिमा त्यागी जब हाथ में कैमरा लेकर चलती हैं तो न केवल पुरुष, बल्कि महिलाएं भी उन्हें हैरानी से पलटकर देखती हैं। पेशे से शिक्षिका रहीं गरिमा आज न केवल शिक्षा, बल्कि समाज सेवा, साहित्य, नाट्य कला और सांस्कृतिक चेतना के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। CG में नक्सलियों का दोहरा खेल: बातचीत की अपील, लेकिन मासूम की जान ली कैमरे से उनका रिश्ता शौकिया तौर पर शुरू हुआ था, जो अब उनकी पहचान बन चुका है। गरिमा बताती हैं कि उन्हें बचपन से पढ़ने-पढ़ाने का शौक था। इसी शौक ने आगे चलकर उनके कॅरिअर की दिशा तय की। गरिमा त्यागी का शुरुआती करियर उन्होंने एमकॉम, बीएड, एमएड, एमटीटी, एमएसडब्ल्यू और मास्टर इन कंप्यूटर साइंस जैसे विविध शिक्षण पाठ्यक्रमों में दक्षता हासिल की और एक स्कूल में शिक्षिका के रूप में कार्य करने लगीं। वह वहां हर सामाजिक-आर्थिक वर्ग के बच्चों से जुड़तीं और उनकी मदद करतीं, लेकिन स्कूल प्रशासन का उनके प्रति जो रवैया रहा, वो उन्हें पसंद नहीं आया और उन्होंने कुछ समय बाद नौकरी छोड़ दी। इसके बाद गरिमा ने आत्ममंथन किया तो उन्हें महसूस हुआ कि शिक्षा केवल एक पेशा नहीं है, बल्कि समाज में बदलाव का एक सशक्त माध्यम है। शौक को बनाया सपना इसी सोच के साथ उन्होंने फोटोग्राफी को अपनाया और समाज की विविध परतों को कैमरे की नजर से देखने और दिखाने का बीड़ा उठा लिया। उन्होंने कभी मुस्कुराते चेहरों को कैमरे में कैद किया, तो कभी जीवन की कठिनाइयों और दुख की कहानियों को उजागर किया। धीरे-धीरे उन्होंने स्कूली बच्चों के आई कार्ड बनाने का कार्य शुरू किया, जिससे एक बार फिर गरिमा बच्चों से जुड़ गईं। कैमरा उनके हाथ में देखकर बच्चे उत्सुक हो जाते और ढेरों सवाल पूछते। इसी जुड़ाव ने उन्हें दो स्कूली बच्चों को गोद लेने के लिए प्रेरित किया, जिनकी शिक्षा और पालन-पोषण की पूरी जिम्मेदारी वह आज भी उठा रही हैं। PM मोदी के जन्मदिन पर महिलाओं के लिए खास तोहफ़ा, बच्चों को भी होगा लाभ संस्था जो शिक्षा, कला और समाज सेवा से जुड़ा वर्ष 2012 में गरिमा ने ‘उम्मीद’ नाम से सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था की नींव रखी। गरिमा के लिए यह संस्था केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक मंच था, जिसके माध्यम से शिक्षा, कला और समाज सेवा को जोड़कर सामाजिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं को जाग्रत किया जा सकता था। इस संस्था के अंतर्गत नाट्य दर्पण, ऑनर्स क्लब, यूनिसेफ एकेडमी, मानवाधिकार सुरक्षा मंच जैसी पहलों के जरिए युवाओं, महिलाओं और बच्चों को जोड़ा गया। फिर आया कोरोना काल, एक ऐसा समय, जब पूरी दुनिया ठहर-सी गई थी, मगर गरिमा रुकीं नहीं। उन्होंने अपनी संस्था के माध्यम से जरूरतमंदों तक दवाइयां, राशन, मास्क, सैनिटाइजर जैसी जरूरी वस्तुएं पहुंचाईं। बच्चों की शिक्षा और मानसिक स्थिति को लेकर गरिमा ने विशेष रूप से काम किया। हालांकि 2021 में कोरोना की दूसरी लहर में उन्हें आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा और संस्था अस्थायी रूप से बंद हो गई। योजनाएं ठप पड़ गईं, लेकिन हौसले कमजोर नहीं हुए। गरिमा और उनके साथियों ने दोबारा हिम्मत जुटाई और संस्था को फिर से खड़ा किया। आर्थिक संकटों के सामने नहीं मानी हार उन्होंने यह सिद्ध किया कि संस्था ईंट-पत्थर की दीवारों से नहीं, विचारों और उद्देश्यों से बनती है। आज गरिमा की संस्था एक बार फिर पूरी ऊर्जा से सक्रिय है। साहित्यिक गोष्ठियों, सांस्कृतिक आयोजनों, सामाजिक अभियानों और डिजिटल मंचों के माध्यम से वह समाज में बदलाव की अलख जगा रही हैं, जिसमें उनका साथ निभा रहा है कैमरा।

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